raj narayan bohare ki kahani



कहानी
                  विस्फोट
                        -राजनारायण बोहरे


                                पुलिस व्हेन  फिर आकर मोहल्ले में रुकी है । इस बार जाने किसकी शामत आई है ? पिछले पांच दिनों से यही क्रम जारी है । हर दिन यह व्हेन आती हेै और मोहल्ले मंे से किसी एक को पकड़ ले जाती है । किसी पर जुर्म है कि वह काकाजी के खेत में आग लगाने का षडयंत्र कर रहा था, किसी पर यह इल्जाम है कि वह उन लोगों में था जिननेे तीन दिन पहले गांव की पुलिया पर बैलगाड़ी लूटी ।
                                किसन सब समझ रहा है, कि यह किसलिये हो रहा है । पर वह है सरकारी कर्मचारी, और मुकाबले पर है एक घाघ ग्रामीण नेता । वैसे किसन अपने बस चलते विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री से लेकर आई. जी. और डी. आई. जी. तक को लिख चुका है पर रिस्पांस जीरो है । जिन पत्रकारों और नेताओं से उसके ताल्लुकात थे, वे भी कोई जबाब नहीं दे रहे हैं । किसन बेबस है । लोग पिट रहे हैं, टूट रहे हेैं । एक अधंेरा छाया है उसके सामने , बाहरी सहायता के नाम पर । जिले जवार के सभी राजनेतिज्ञ मौन हैं ।
                                किसन ने दो वर्ष पहले एम. ए. किया है -राजनीति शास्त्र से, पर जाने राजनीति की कौन सी किताब खोले बैठे हैं काकाजू  कि किसन उनके समक्ष उजबक साबित हो रहा है ।  प्लेटो से वर्क तक तथा बैंथम लगायत आधुनिक विचारकों तक किसी ने नहीे बताये वे सिद्धांत जो यह निरक्षर बूढ़ा प्रयोग कर रहा है ।
                                किसन इसी गाँव का बेटा है । इसी माटी में खेला-कूदा बड़ा हुआ है । छोटा था तब उसने भी ढोर चराये हैं काकाजू के । किसन के पिता ठाकुर सिंगराम सिंह रिश्ते मंे काकाजू शिवराम सिंह के फुफेरे भाई थे लेकिन रिश्ते और बिरादरी बाजी का निभाव भला गरीब और अमीर के बीच कभी हुआ भी है । कहने भर को रिस्ता था, अन्यथा-नौकरी करने -किसन के पिता तड़के उठकर काकाजी के यहां पहुंचते तो रात गये ही लोट पाते         थे । तब बहुत थके होते थे वे, किसन ही उनके हाथ पांव की मालिस करता । पिता खूब बातें करते उससे । किसन अंजान था तब । एक बार पिता के बदन में हरारत देखकर तड़प के वह बोला था-दादा तुम काकाजू से कहि के कछु दिना आराम न कर लेओ ।
                भईया की बातें, लल्ली एसो नहीं हो सके, पिता बोले ।
                काहे जा में का रोक है ?
                बेटा, हम नौकर आदमी हैं । हमाये लाने आराम हराम कहो जाये ।
                वाह दादा, नौकर तो लटूरी, फुल्ला, हल्का औरे है, तुम तो काकाजू के भैया हो ना ।
                तुम नई समझौते लल्ली, जे सब दुनियादारी की बातें ।
                तूमई तो लटूरी कक्का से कह रहे थे, कि काकाजू से अपनी लिंगा की रिश्तेदारी है ।
                बेटा रिश्तेदारी भी बराबरी बारों में निभाई जाती है । हम उनते बहुत छोटे हैं, उनके नौकर-चाकर बरोबर
                फिर जातो बताओं कै अबै काकाजू के इते कौन सा ज्यादा काम पड़ रहो है ? तुम सब रात दिना जुत रहे हो ।
                किसन अब तुम्हें का समझायें - जमीन को सीलिंग हो रही है ।
                कैसी सीलिंग
                तुम नई समझोगे । सिरकारी काम-काज में सिलिंग माने जमीन को जांच पड़ताल कै कौन के ढ़िग जादा जमीन है, और कौन पे कतई नई है ।
                जासे का होयेगो ?
                जे के पास बिलकुल जमीन नई होयेगी, वा को पॉच बीघा जमीन मिलेगी । जे के पास ज्यादा होयेगी वा से ले लई जायेगी ।
                अरे, जा तो अच्छी भई । हम खों भी मिल जायेगी ।
                नई रे लल्ली, हमें नई मिलेगी । हम छोटी विरादरी के नहीं हैं न । जे सब परबंध तो छोटी जात वारों को हो रहे हैं ।
                तो हमें काकाजू....................
                अब हमें सो जान दो.....कहकर अधूरी बात छोड़कर पिता सो गये थे । किसन सोचता रहता, कि कित्ती झूठी-झूठी बातें पढ़ाई जाती हैं उनके स्कूल में । उसकी नवें क्लास की किताबों में लिखा है कि देश का हर आदमी आजाद है अब । सरकार सबके बीच पैसे और काम का बंटवारा कर रही है । देश आगे बढ़
रहा है । लोग जिसे चाहें वोट दें । जो चाहे खड़ा हो जाये, पूरी आजादी है सबको । प्रजातंत्र है देश में ।
समाजवाद लाया जायेगा ...........और भी न जाने क्या क्या ।
                                किसन सोचता कि उसके गॉव में कोई अलग कानून लागू है शायद । न यहां आजादी है न कोई कानून । काकाजू के यहां दर्जन भर खानदानी बधंुआ मजदूर है । गॉव में ताना शाही है । सो कभी कहीं कोई शिकायत नहीं हुई । वह सोचता कहां हेै प्रजातंत्र ? काकाजू यहां के बिना मुकुट राजा हैं और सब प्रजा ।  वे जिसको चाहते हैं, असे सरपंची के लिये खड़ा कर देते हैं, जिता देते हैं । जहां चाहते हैं, वहां गाँव भर के वोट गिरवा देते हैं एक मुश्त । किसकी हिम्मत है जो काकाजू की मर्जी के खिलाफ चुनाव में खड़ा हो जाये । इस गॉव में सिर्फ काकाजू की मर्जी चलती है । किताबों की बाते तो सिर्फ किताबों में हैं । इस गाँव की मेड़ से बाहर हैं उसके सारे विवरण, सब प्रावधान, सारी परिभाषा ।
                                फिर एक दिन थके मांदे पिता घर लौटे तो ज्यादा बीमार लग रहे थे । भीषण बुखार था, बदन तप रहा था । माँ ने अमरबेल का काढ़ा बना के दिया फिर हल्दी डालकर दूध पिलाया, हाथ-पाँव दबाये और कथरी गदूला में दाब के सुला दिया । सुबह जाके बुखार कुछ कम हुआ ।
                                किसन दौड़ता हुआ गड़ी गया, काकाजू से यह कहने कि आज दादा को बुखार है सो आ नहीं   पायेंगंे । हवलदार पिरथीसिंह रास्ते में ही उसे पकड़ के बोला -अरे बुखारई है, कछु बात नईं । मर्द आदमी इनकी चिन्ता नईं करे । जा बुला ला कि आज पटवारी साब आ रहे हैं -जमीन नापवे । तुमारे दादा को आवो जरुरी           है ।
                                किसन किंकर्तव्यविमूढ़ सा वहीं खड़ा रहा तो पिरथी सिंह उसे गरियाते हुये घर गया और स्वंय ही पिता को उठा लाया था । किसन भी दादा के पीछे पीछे खेत पर पहुंच गया था । वह हैरान रह गया था कि पिता इस हालत मैं भी भाग भाग कर जरीब फैला रहे थे । इस काम को तो कोई भी कर सकता था , नाहक ही पिता को परेशान किया था ।
                                किसन काकाजू की ओर बढ़ा -काकाजू दादा बीमार हैं , उन्हें छुटटी दे देओ । कोई और से जरीब खिंचवा लो ।
                                अरे दूर भाग नपूते , तेरो दादा तीन सोै रूपया का मुफत के लेत है ? काकाजू उस पर बिफर उठे थे और उसे वहां से हटा दिया गया था । उसने एक नजर पिता को देखा तो कराह के रह गया था । पिता की आँखों में मौजूद जो मौन वेदना उस दिन देखी थी किसन वह आज भी याद करके कंप जाता है । 
                                वह चुपचाप घर लौट आया था और अपनी किताब उठाकर पढ़ने लगा था ।
                                तीसरे पहर दरवाजे पर हल्का चिल्लाया -भौजी, तनिक दादा को संभाल लेउ । जादा बीमार है ।
                                बाहर बैलगाड़ी मैं पिता की मूर्छित देह थी, उन्हे उतारा गया और अंदर लाया गया ।
                                बाद मंे पिता को तीन दिन तक होश नहीं आया । किशन उनके इलाज के लाने बैद बुलवाने की प्रार्थना लेकर काकाजू के पास पहंुचा, तो वे चिल्ला उठे - अरे हटाओ रे इस पिल्ले को यहां से । बड़ा आया बाप का तीमारदार ! एक तो हमारो काम हर्जानो हो रहो है, ऊपर से कहवे आओ के बैद बुलवादो । रोज के रोज आ के ठाड़ो हो जात ससुरो ।
                                वैद्य नहीं आया था, हां उसी रात यमराज आये थे , और पिता को ले गये थे -अपने साथ ।
                                तेरही होते -न - होते हवलदार पिरथीसिंह ने उनका सामान मकान से उठाकर फेंक दिया  था जहां वे अब तक रहते थे । किसन के मामा कस्बे में रहते थे , वे आये और दोनो को लिवा ले गये । किसन की पढ़ाई चलने लगी थी । दिन कटने लगे थे किसी तरह ।
                                कस्बे में रह कर ही किसन ने बी00करके एम00 किया, और नौकरी की जुगाड़ मंे लग गया 
हर छोटी बड़ी नोैकरी का आवेदन किया, इन्टरव्यू दिया । लेकिन नोैकरी मिलना क्या सरल है ?न उसका कोई रिस्तेदार एम0एल00 था न कोई चाचा मंत्रंी, सो वह सब जगह निराश हुआ । हर जगह से ठोकर खाने के बाद उसने शिक्षा विभाग का पल्ला पकड़ा और संयोग से अपने ही गॉव में नियुक्ति पा गया -अध्यापक की ।
                                दिन भर गॉव के बच्चों को शाला में शिक्षा देता और शाम को चौपाल पर बैठ कर गॉव वालो से दुनियां जहान की बातें करता । गॉव में रमने लगा था वह ।
                जाने पहले का गुस्सा था या परिस्थितियों का दबाब कि गॉव के लोग धीरे-धीरे उसके गहन संपर्क में आके काकाजू से दूर होते गये, और वह गॉव के विकास के लिये जीजान से जुट गया ।
                                गॉव में अनौपचारिक शिक्षा का केन्द्र खुला । गॉववासी सरकारी अफसरों के सम्पर्क में आये । लोग जागरूक हुये । कुछेक ने अपने बच्चे येन-केन-प्रकारेण कस्बे तक पढ़ने के लिये भेजे । ऐक  डेढ-बरस के अन्तराल में ही गॉव बदल सा गया । जिले तहसील से कोई अफसर -अहलकार आत लोग उसे घेर लेते , गॉव की समस्याऔं के लिये । कभी बिजली ,कभी स्वास्थ,तो कभी रोड के लिये प्रतिवेदन दिये जाते । किसन खुद सदा पीछे रहकर उन लोगों को ही प्रेरित करता-बातचीत के लिये । वे लोग बात करना सीखने लगे ।
                                गाँव में सहकारी बैंक खुला । सहकारी समिति बनी और उसने बीज-खाद बाँटना शुरू कर        दिया । लोगों ने काकाजू और उनके फिछलग्गू लालता बनिया से छुटकारा पाया । चार-छह लोगों को पशु पालन और कुटीर उद्योग के लिये कर्ज मिल गया । हरिजनों के लिये इंदिरा आवास बने ।
                                जनम-जिन्दगी के गुलाम गाँव वाले दोपहर को चौपाल पर सीना तान कर इकठठे होने लगे । किसन आँख का तारा हो गया था गाँव वालों का । बच्चे की पढ़ाई ,बहू का प्रसव और शादी -ब्याह के मसलों पर लोग उसी से सलाह लेते । वह घर -घर का परिवारिक सदस्य बन गया था ।
                                भोले ग्रामवासी किसन के प्रति सदा शुक्र गुजार रहते । किसी के घर नयी भैंस ब्याती तो ’’पेवशी‘‘ (प्रसव के बाद निकलने वाला विशेष दूध) का पहला हकदार किसन होता । ज्वार के भुटटे आते तो ग्राम देवता की तरह पहला चढ़ावा किसन के घर आता, लोग खुद भुट्टा भूनते और गर्म-गर्म ज्वार के गदा  (ज्वार के अधपके       दूधदार मीठे भुने दाने) किसन को खिलाते । गेंहू की बाल हो या चने के बूट ,किसन को अपने खेत की मेड़ पर बिठा के होला भून कर खिलाना हर आदमी परम आवश्यक समझता । दूध , गेहंू ,चना ,दालें दफारें और ग्रामीण सब्जीयॉ किसन को कभी बाजार से नहीं खरीदने दीं -उन लोगें ने । किसन लाख ना ना करता, पर कोई न मानता ।
                                किसन की सक्रियता का गाँव के उन ऐजेंट नुमा छुटभैया नेताऔं पर भी असर पड़ा था जो एक नये वर्ग के रुप में उभर रहे थे । सरकार की किस योजना से किस आदमी को लाभ दिला कर कमीशन खाया जा सकता है ? इस बात की पक्की जानकारी इन लोगों को रहती है । बैंक बाबू से लेकर कृषि विभाग और ब्लॉक दफतर के अफसर अहलकार तक से रामा श्यामी बनाये रखते थे ये ऐजेंट नुमा नेता । गॉव वालों के पास अब जब किसन जैसा जानकार परामर्शदाता था तो दलालों के पास कोैन जाये ? धीरे -धीरे दलालों का धंधा चौपट हुआ तो वे सव भी किसन के दुश्मन बन गये और काकाजू के साथ जुड़ गये । लेकिन किसन अपने इर्द गिर्द की दुनियां में खुश था उसे कोई चिन्ता थी -न फिकर ।
                                किसन ने अपने धर पर एक टेलीविजन लगा रखा था ,जिसके उपर एक डिस -एंटीना भी लगा रखा था । इस कारण दुनिया भर की तमाम चैनल रात-दिन गाँव वालों के सामने सूचना का अनंत संसार खोले         रहते । शाम से लेकर रात गये तक सैकड़ों लोगों का जमावड़ा किसन के घर पर बना रहता ।
                                उन्हीं दिनों की बात है । प्रदेश में चुनाव हो रहे थे । हर पार्टी अपने समीकरण बैठा रही थी । हर गॉव मैं बैठे वोट के थोक ठेकेदारों की चांदी ही चांदी थी । इस गाँव का ठेका पच्चीस तीस साल  से काकाजू के पास रहा है सो नेता लोग वहीं आते । एक निर्दलीय उम्मीदवार भटकता हुआ इस बार किसन तक आ पहंुचा, किसन ने उसे गाँॅव वालों तक पहंुचा दिया । बात चीत हुई और दो हजार की पोलिगं वाले इस गॉव ने उससे वादा किया कि इस बार यहाँॅ के वोट उसे ही मिलेंगे ।
                                चुनाव हुये, और यह भी संयोग रहा कि वह निर्दलीय उम्मीदवार केवल पंन्द्रह सौ मतों से चुनाव जीत कर विधायक चुन लिया गया ।
                                काकाजू भुन्ना गये और जिला शिक्षा अधिकारी से लिखित में शिकायत कर आये कि किसन नाम का शाशकीय शिक्षक राजनैतिक गतिविधियों में लिप्त है इस शिकायत के साथ जिला शिक्षा अधिकारी को कुछ रकम भी सौंपी उन्होने ।
                                किसन को सस्पैण्ड करने का आदेश लेकर एक चपरासी जिला मुख्यालय से आया तो किसन हतप्रभ था । गॉव में तो आग ही लग गई । लोग मुखर हो उठे । किसन अपने घर  में ही बैठा रहा, पर ग्रामवासी सक्रिय रहे ।
                                जिला मुख्यालय पर जुलूस धरना और विधायक की सक्रियता से तीसरे दिन ही किसन इसी गाँॅव में बहाल हो गया । उधर भोपाल जाकर विधायक ने ऐसा रंग दिखाया कि भ्रष्टाचारी जिला शिक्षा अधिकारी को इंटर कालेज का प्राचार्य बनाकर तबादला कर दिया गया ।े
                                काकाजू कुपित हो उठे । उन्होने किसन के नजदीकी लोगों को सताना शुरू कर दिया । उधर काकाजू के हरवाहों ने भी एक-एक कर नौकरी छोड़ना शुरू कर दिया । काकाजू परेशान हुये  और सक्रिय भी वे तुरन्त ही जिला मुख्यालय पहंचे ।
                                जाने क्या गुल खिलाया उन्होने कि एकाएक पुलिस सक्रिय हुई । एरिया के तमाम अपराधों के लिये केवल वे ही दोषी पाये जाने लगे जो कभी न कभी काकाजू के हरवाहे या नौकर रहे थे ।
                                लटूरी, हल्का, फुल्ला जैसे प्रोैढ़ों से लेकर टीकम और ललसीगां जैसे किशोर गिरफतार कर लिये गये तो किसन सक्रिय हुआ था । आज छंटवां दिन हे यह चक्र चलते हुये । वह सबको लिख चुका है यहां तक कि अखबार को भी, पर कहीं ये कोई प्रत्युत्तर नहीं आया अब तक । किसन भीतर ही भीतर परेशान हेै
                                ‘‘मास्टरजी आपको दरोगाजी बुला रहे हैं ’’ एक सिपाही उसे टोक रहा था । उसने देखा हाथ में डंडा लिये वह वेन की ओेैर इसारा कर रहा है ।
                                किसन मुस्काराया तो आज मेरी ही बारी हेै फिर बोला ‘‘ठीक है भई चलता हूं ।’’
                                कुर्ता ओैर लुंगंीं उतारकर उसने पैंट शर्ट पहने और सिपाही के साथ चल दिया ।
                                क्या जुर्म होगा मुझ पर -वह सोच रहा था । चोरी दंगा या षडयंत्र, इनमें से कोई होगा या यह भी हो सकता हे कि अभी कोई जुर्म सोचा ही न हो । जो भी लगाया जाये सीधा कोतवाली में लगाया जाये । प्रायः ऐसा ही होता है ।
                                अरे यहां तो सारा गॉव इकठठा है व्हेन के पास पहुंचकर उसका माथा ठनका । क्या बात हेै ?
                                दरोगा उसे देखकर गुर्राया -यू आर अन्डर अरेस्ट मिस्टर किशन ।
                                ’मेरा जुर्म बतायेगें आप ? ‘
                                वह सब कोतवाली मंे पता चलेगा, आप वेन में बैठिये ।
                                ’ठीक हैकंधे उचकाता सा वह बोला और वेन के पीछे बने दरवाजे की ओर बढ़ा । तभी एक नारी स्वर ने उसे टोका -मास्टरसाहब आपको पकड़ नाही सकेगी पुलिस । पहले हमारी लाशों से गुजरेगी तब आप तक पंहुचेगी । रुको आप । गाड़ी में मत बैठिये ।
                                वह चौंका । मुड़कर देखा तो लटूरी की निरक्षर पत्नी चंपा की आँॅखें क्रोध से फटी पड़ रहीं थीं, उसी ने टोका था किसन को ।
                                चंपा की हाँं में हांँ मिलाते हुये, फिर तो वहां मौजूद सभी स्त्रियाँ और बच्चे चीखने लगे -हमारे मास्टर साब को कोई नहीं पकड़ सकता ।
                                जाने किसने सिखाया था उन्हें यह अहिंसक विरोध, कि वे सब के सब एक-एक कर पुलिस वेन के चारों ओर लेटने लगे । जिसे देख पुलिस कर्मचारियों के माथे पर बल पड़ने लगे ।
                                मास्टर जी की ओर ताकते पुलिस दरोगा ने अपनी बेबसी प्रकट की तो मास्टर जी यानी किसन मुस्करा उठा । उसकी सुलगाई आग अब चिंगारी बन चुकी है, जल्दी ही विस्फोट होगा । यह सोचता हुआ वह मन ही मन आश्वस्त हुआ । उसका मिशन पूरा हुआ , गाँव अब सचमुच आजाद हो जायेगा-गाँॅव भी, गरीब भी और स्त्रियां भी ।
- राजनारायण बोहरे
एल- 19 हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी
दतिया (म.प्र.)

                                                                                               
                                                                                                                                                                                                               


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